मेरा खत अपनी माँ के नाम



माँ मैं घर वापस आ रही हूँ

जो सपने लेकर घर से बाहर निकली थी
उन्हें अपने आँखों में वापस ला रही हूँ
माँ मैं घर वापस आ रही हूँ।

हर तरफ मैं डर का एहसास करती हूँ
अब हर एक नर से मैं डरती हूँ
जो ख्वाब तेरे थे उन्हें मैं पूरा नहीं कर पा रही हूँ
माँ मैं घर वापस आ रही हूँ।

सोचा था माँ मैं तेरा नाम रोशन करूंगी
बेटियां बोझ नहीं होती इसे पूरा करूंगी
पर शायद मैं बोझ अब बनने जा रही हूँ
माँ मैं घर वापस आ रही हूँ।

अगर न आई घर वापस तो किसी दिन हमेशा के लिए गायब हो जाऊंगी
किसी के लिए निर्भया तो किसी के लिए दामनी बन जाऊंगी
सारे सपने तोड़ तेरे आँचल में सिमटने आ रही हूँ
माँ मैं घर वापस आ रही हूँ।

जब घर में रहूंगी बंद ना मुझे कोई देख पाएगा
जब देखेगा ही नहीं तो आबरू कैसे लूट पाएगा
खुद को कमरे मैं कैद मैं करने जा रही हूँ
माँ मैं घर वापस आ रही हूँ।
आकांक्षा सिंह

10 Comments

Unknown said…
अतीव सुन्दर पंक्तियाँ
Unknown said…
अतीव सुन्दर पंक्तियाँ
Unknown said…
sateek abhivyakti
akanksha singh said…
धन्यवाद
akanksha singh said…
धन्यवाद
akanksha singh said…
धन्यवाद
pulkit khare said…
बेहद सराहनीय... पर इन पंक्तियों से डर का व्याप्त होना झलक रहा है कृपया इस डर के खात्मे के लिये भी कुछ एेसा आकर्षक.. इंतजार रहेगा...
akanksha singh said…
जरूर पुलकित जी
Unknown said…
बहुत सुन्दर