मृत्युदंड :पानी पीने की सजा

प्यास ना देखे जाति धर्म


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सात साल का शंकर आज खटिए पर पड़ा अपनी अंतिम सांसे गिन रहा था...

शंकर अभी कुछ महीने पहले ही अपनी मौसी के यहां आया था...माता परलोक सिधार गईं तो पिता ने दूसरी शादी कर ली...दूसरी पत्नी के रंगरूप ने ऐसा मोहा कि पुत्र मोह भी छूट गया और सात साल के बेटे को भेज दिया उसकी मौसी शांती के यहां...

शांति के पति रामु धर्म कर्म के पंडित थे और इधर-उधर कथा वाचने चले जाते थे...लेकिन आमदनी महीने के 100 रुपए भी ना जुटा पाते...रामु जी सोचते कि शहर जाकर मजदूरी करूं तो शायद महीने के 200 रुपए तो मिल ही जाएंगें...लेकिन पंडित को सिर्फ पंडताई ही शोभा देती है...क्या सोचेंगे गांव के लोग हमारा तो हुक्का पानी बंद हो जाएगा...शांति के खुद तीन बेटियां और एक लड़का था...ऊपर से बहन का बेटा शंकर भी उनके ऊपर बोझ बनने आ गया...लेकिन शांति करती भी तो क्या, कैसे कहती कि खुद के बच्चों का तो पेट ही नहीं भर पा रही हूं इसका कहां से भरूंगी...शांति गरीब भले थी लेकिन मायके और रिश्तेदारी में सबको यही बता रखा था कि पूजा पाठ से पंडित जी की अच्छी कमाई हो जाती है....उसी झूठ को छिपाने के लिए उसने शंकर को अपने पास रख लिया...सात साल का शंकर अब रामु के साथ पूजा पाठ में बैठने लगा एक ही महीने में उसने काफी कुछ सीख लिया...रामु अब हर जगह शंकर को साथ लेकर जाने लगा और उसकी कमाई भी अच्छी होने लगी...क्योंकि जहां पहले सिर्फ रामु के पैर छूकर दक्षिणा दी जाती थी वहीं अब शंकर के भी पैर छुए जाने लगे और उसे भी दक्षिणा मिलने लगी....लेकिन रामु के जीवन में ये सुख ज्यादा दिन का ना था....

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सर्दियां आ चुकी थी... एक दिन शंकर गांव के कुछ बच्चों के साथ खेल रहा था...प्यास लगी तो एक घर में घुसा और पानी मांगकर पी लिया...तब तक किसी ने शांति को इस बात की खबर दे दी कि शंकर ने रामदीन के घर का पानी पी लिया है...बेचारी शांति सारे कामकाज छोड़कर भागी...खबर देने वाले को कहा कि किसी और को इस बात की खबर ना दे...शंकर अभी भी बच्चों के साथ खेल रहा था...शांति को दौड़ता आता देख वो डर गया...शांति ने पहुंचते ही शंकर के कोमल गालों पर झापड़ जड़ दिए और मारते हुए कुएं पर लेकर गई...बच्चे भी शंकर के पीछे-पीछे चल दिए...शंकर रोए जा रहा था उसके हाथ पैर कांप रहे थे...शांति ने शंकर को कपड़े उतारने के लिए कहा और खुद बाल्टी और साबुन की टिकिया लेने घर में चली गई...शंकर कपड़े उतारे खड़ा था...ठंड के मारे वो कांप रहा था...शांति ने कुएं में बाल्टी डालकर पानी निकाला और शंकर पर डाल दिया...पानी पड़ते ही शंकर की रूह तक कांप गई...शांति साबुन से उसके शरीर को ऐसे रगड़-रगड़ के धो रही थी कि मानों आज उसकी चमड़ी ही उढ़ेड़ देगी...बो बड़बड़ाए जा रही थी...गांव में अब कौन हमसे पूजा पाठ करवाएगा...सूद के यहां का पानी पी लिया है...भगवान कभी ना माफ करेंगें...फिर वो हाथ जोड़कर आसमान की तरफ देखते हुए बोलती...है दीनानाथ बेचारा बालक है गलती हो गई माफ कर दीजिए...लगभग आधे घंटे नहलाने के बाद भी शांति का मन ना माना तो बिटिया को घर से गंगाजल लाने को भेज दिया बिटिया दौड़ते हुए गंगाजल लेकर आई...शांति ने पानी में एक लोटा गंगाजल मिला और पूरी बाल्टी फिर से शंकर पर डाल दी...और एक लोटा गंगाजल शंकर को पिला भी दिया जिससे शंकर पूरी तरह से शुद्ध हो सके... ठंड के मारे शंकर का शरीर नीला पड़ने लगा था....वो भागते हुए घर में गया और कपड़े पहने...शांति ने घर में अलाव जलाया और शंकर को उसके सामने बैठा दिया...ठंड ने शंकर को जकड़ लिया था...वो कांपें जा रहा था...शांति की बातों से उसे ये तो पता चल गया था कि उससे क्या पाप हुआ है...अब उसे बस डर था भगवान के दंड का...

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वो बालमन तो ये भी ना जानता था कि हर इंसान भगवान का ही रचा है तो भी भगवान भेदभाव क्यों करेगा...शंकर इतना तो जानता था कि नीची जाति के लोगों के यहां पानी ना पीना है...लेकिन जब उनके यहां कथा बांचने जा सकते हैं और उनसे दक्षिणा ले सकते हैं तो फिर पानी क्यों नहीं पी सकते...

शंकर को बुखार ने जकड़ लिया...बुखार ऐसा कि शंकर ने खटिया पकड़ ली...शांति भगवान को मनाने में लगी थी बोलती कि ये शंकर की गलती का नतीजा है...वहीं रामु ने जब देखा हालत बिगड़ रही है तो वैध को बुला लाया...वैध ने देखा तो बोले कि ठंड लगी है...कुछ दवा दी और चले गए...दवाओं का भी शंकर पर कोई असर ना हुआ और आज खटिए पर पड़ा वो अपनी अंतिम सांसे गिन रहा था...शंकर की आंखो के सामने अंधेरा था...उस अंधेरे में एकाएक उसे एक चमक सी दिखाई दी शंकर ने देखा सामने उसकी अम्मा खड़ी हैं...शंकर अम्मा उसका सिर अपनी गोद में रख लिया शंकर की आंखों से आंसु निकल रहे थे...वो अम्मा से बोला...अम्मा मैंने नीची जाति के यहां का पानी पिया है इसिलिए भगवान ने मुझे ये सजा दी है...अम्मा ने शंकर के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा...नहीं बेटा ये दुनिया तेरे लिए नहीं यहां जीवन से ज्यादा जात-पात मायने रखती है इसीलिए भगवान तुझे अपने पास बुला रहे हैं क्योंकि यहां भगवान के यहां जात-पात में कोई भेदभाव ना है सबको एक समान माना जाता है...अम्मा की बात सुनकर शंकर के चेहरे पर एक चमक सी आ गई तेज इतना कि अगल बगल बैठे गांव वालों की आंखे चौंधियां जाए...चेहरे पर एक अलोकिक मुस्कान के साथ उसने अंतिम सांस ली और जाति धर्म से दूर एक नई दुनिया में चला गया...

वहीं शांति ये मानने को तैयार ना थी कि शंकर की मौत उसे कड़कड़ाती ठंड में आधे घंटे नहलाने के कारण हुई है...उसे तो बस यही लगता कि भगवान ने शंकर को उसकी गलती के लिए माफ ना किया।

पढ़ने के लिए क्लिक करें- सखी सहेली और फिर सौतन

नोट: ये कहानी काल्पनिक है और मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई है...इस कहानी का उद्देश्य किसी भी धर्म या जाति को बढ़ावा देना या फिर नीचा दिखाने का नहीं है और ना ही किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का है।

3 Comments

MAHANAND SINGH said…
बढ़िया कहानी
Unknown said…
बेहतरीन कहानी है । प्रस्तुतीकरण एवं लिखने की शैली अच्छी है । जात-पात एवं भेदभाव की कड़ियां टूट रही हैं लेकिन गांवों में अभी भी इसकी झलक दिखाई पड़ती है । आने वाला समय इन कड़ियों को समाप्त कर देगा ।
akanksha singh said…
जी बिल्कुल सही कहा आपने
धन्यवाद अपने विचार रखने के लिए।