शादी की दावत और दो पैरों के मोजे

दावत की लालच में बालमन


shadi ki dawat

अंशु आज बहुत खुश थी...आज पांत (दावत) का बुलावा जो आया था...सामने मेडिकल की दुकान पर जो मुकेश अंकल बैठते हैं उनकी बहन की शादी थी...पूरे घर को दावत पे बुलाया था...अंशु के मुंह में तो सोच-सोचकर ही पानी आ रहा था...आज स्कूल में भी उसका मन ना लगता था...शाम को दही बूरा जो खाने वाले थी...वो तो अभी से ही पूड़ियों की खुसबू लेने लगी थी...रायते के बारे में सोचकर उसके मुंह में पानी आ जाता...बस यही मना रही थी कि जल्दी से छुट्टी हो तो घर जाउं...वहीं इसका उलट महिमा के मन में खाने को लेकर कोई उत्साह और लालसा ना थी...महिमा और अंशु बहने थी और दोनों एक ही स्कूल में पढ़ती थी...दोने के पिता हरीश एक सरकारी कर्मचारी थे और लगभग आठ साल से गांव से बाहर शहर में अपने बीवी बच्चों के साथ रह रहे थे...शुरुआत में तो वो एक इलाइची तक ना खाते थे...लेकिन संगत ऐसी लगी कि हर वक्त शराब के नशे में रहने लगे...तनख्वाह का आधा पैसा अपने गांव भेजवा देते और बाकी जो बचता उसमें शराब और घर का खर्च किसी तरह चलता...हरीश की बीवी सीता बिल्कुल अपने नाम की तरह ही सीधी थी...हर दुख दर्द मारपीट सहती लेकिन मुंह से एक शब्द ना निकलते...ऐसा मालूम होता कि उसने अपनी दुर्दशा को ही अपना भाग्य मान लिया था...


शादी को दस साल हो चुके थे दोनो के दो बच्चे...अंशु (छ: साल) और महिमा (आठ साल) की थी। दोनों का नाम एक सरकारी स्कूल में लिखा दिया गया था...वहीं गांव से सास हमेशा दबाव डालती कि एक लड़का पैदा कर ले वरना कुल कैसे आगे बढ़ेगा...सीता सोचती कि दोनों लड़कियों को ढंग से कपड़े-लत्ते पहना नहीं पा रही है तीसरा हो गया तो भीख मांने की नौबत ना आ जाए...

छुट्टी हुई...महिमा और अंशु खुशी-खुशी अपने घर आए...और आते ही मां से पूछा...मां दावत के लिए कब चलना है?...सीता दुखी मन से जवाब देते हुए बोली...हम ना जाएंगे सिर्फ पापा ही जाएंगे...

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ये सुनकर अंशु का दिल टूट गया...आखों में आसु आ गए..भारी आवाज में बोली...लेकिन क्यों मां? अंकल ने तो हम सबको बुलाया है...सीता ने थोड़े गुस्से में जवाब दिया...ऐसे ही किसी के बुलाने से नहीं जाया जाता है...सीता अपने बच्चों को नहीं बताना चाहती थी कि उसके पास कोई ढंग की साड़ी तक नहीं है कि वो शादी समारोह में उसे पहनकर शामिल हो सके...और फिर मोहल्ले की सारी औरतें वहां होंगी...वो यही सोचेंगी कि पैसा तो इतना आता है लेकिन ढंग के कपड़े भी ना हैं...और फिर बच्चों के पास भी तो कपड़े और जूते नहीं हैं...इतनी ठंड में वो उन्हें कैसे बिना जूतों के भेज दे...और फिर उसके बिना बच्चों को संभालेगा कौन...

अंशू का दिल टूट चुका था...दावत खाने के सारे सपने चकनाचूर हो चुके थे...और वो अपनी सहेलियों से भी तो बोल चुकी थी कि वो उनसे दावत में मिलेगी...वहीं महिमा के सपनों पर भी पानी फिर चुका था कि आज उसे नए कपड़े पहनने को मिलेंगे...

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शाम हुई...हरीश घर आया तो देखा कोई तैयार ना था...हरीश ने आज शराब नहीं पी रखी थी...उसने सीता से पूछा...क्यों चलना नहीं है क्या? कि शादी खत्म होने के बाद जाओगी?

सीता ने बहाना बनाया कि मेरी तबियत ठीक नहीं है जी आप ही चले जाओ।

हरीश ने कहा, देखने में तो अच्छी भली दिख रही हो...क्यों नाटक करती हो...तैयार हो जाओ मुकेश क्या सोचेगा...सीता ने फिर कहा...कुछ ढंग का पहनने के लिए नहीं है क्या ऐसे ही चली जाऊं?...

क्यों शादी में जो साड़ियां लाई थी वो फट गई क्या?...

अच्छा वो सिल्क वाली साड़ी पहनों ना जो मुझे पसंद है...

हर जगह वही साड़ी पहनकर जाती हूं...और ठंडी में कोई ढंग का स्वेटर भी ना है पहनने के लिए...सीता टुनकते हुए बोली।

मैं जा रहा हूं और अभी किसी को भेजता हूं तैयार मिलना...मुझे कोई सफाई नहीं चाहिए...और फिर ये बोलते हुए हरीश मुकेश के यहां जाने के लिए निकल गया कि काम में कुछ हाथ बंटाएगा...

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सीता सोच में पड़ गई कि अगर वो तैयार नहीं हुई तो फिर रात में घर में कलह होगी और हो सकता है कि उसे मार भी पड़े...एक तरफ जहां सीता दुखी थी तो वहीं दूसरी तरफ महिमा और अंशु की खुशी का ठिकाना ना रहा कि अब तो मां को हमें लेकर चलना ही होगा...उनको क्या पता था कि मां क्यों मना कर रही है...सीता पहले दोनों बच्चों को तैयार करने लगी...उसने दोनों को अंदर स्कूल वाला स्वेटर पहनाकर ऊपर स फ्रॉक पहना दी...फ्रॉक नई थी क्योंकि अभी भैयादूज पर बेटे का तिलक करने पर मकान मालकिन ने तोहफे में दोनों को फ्रॉक दी थी...अच्छी ना सही लेकिन नई तो थी...दोंनो खुश थी...लेकिन अब पैरों में क्या पहनाऊं...स्कूल वाली जूतियां पहना देती हूं ठंड नहीं लगेगी...लेकिन मोजे तो मैंने अभी धो दिए...है भगावान मेरी बुद्धी मारी गई थी जो मैंने स्कूल वाले मोजे धुल दिए...बिना मौंजो के जूतियां पहना देती हूं...लेकिन ठंड लग जाएगी मेरी बेटियों को...इनके मोजे पहना दूं क्या?...नन्हें-नन्हे पैरों में ये मोजे कैसे आएंगे...ढूढ़ती हूं कहीं पुराने मोजे मिल जाएं...फटे भी होंगे तो भी पहना दूंगी..कम से कम ठंड से तो बचेंगे मेरी बेटियां...सीता ने पूरी अलमारी उलट डाली...दो मोजे मिले...


socks

लेकिन दो तरह के ये पुराने वाले स्कूल के हैं...एक सफेद तो एक नीला...अब क्या करूं कुछ समझ में नहीं आ रहा...हाय रे मेरी फूटी किस्मत पैसा होते हुए भी मैं कितनी गरीब हूं कि अपने बच्चों के लिए कपड़े तक नहीं खरीद पा रही...सीता अपनी किस्मत को कोस रही थी...अबकी अगर गांव से पैसा लेने जेठ जी आए तो साफ मना कर दूंगी कि हमें हमारा परिवार भी देखना है...उनके बीवी बच्चे हमारे पैसों से मौज कर रहे हैं और यहां मेरे बच्चों के पास ठंड में पहनने के लिए मोजे तक नहीं है...

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देर हो रही थी अभी कोई ना कोई आता ही होगा लेने...और मैं भी तैयार नहीं हुईं हूं...ये सोचकर सीता डर गई और जल्दी से बच्चों के पास गई...सीता के लिए ये बहुत कठिन फैसला था कि वो मोजे किसे पहनाए और किसे ठंड से सिकुड़ने के लिए छोड़ दे...फिर उसने दिल पर पत्थर रखकर महिमा से कहा कि तुम बड़ी हो इसीलिए तुम मोजे नहीं पहनोगी...और ये बोलते हुए उसने अंशु के पेरों में दो अलग-अलग रंग के मोजे पहना दिए...


shoes

वहीं महिमा ने सिर्फ स्कूल वाली काली जूतियां पहन ली...अंशु भले ही छोटी थी लेकिन इतना तो जानती ही थी कि दो रंग के मोजे नहीं पहने जाते...लेकिन उसका बाल मन दावत में जाने को ज्यादा ललयित था इसीलिए उसने मोजों को अनदेखा कर दिया...बच्चों को तैयार कर सीता भी तैयार होने लगी...तभी किसी ने नीचे से आवाज लगाई.. भाभी जी...तैयार हो गईं क्या...सीता ने बाहर निकलकर देखा तो खुद मुकेश खड़े थे...बोले..भाभी जी भइ्या ने बाताया कि आप आना ही नहीं चाहती थी?...सीता झेंपते हुए...नहीं वो तबियत नासाज लग रही थी इसलिए मना कर रही थी...


भाभी जी जल्दी कीजिए देखिए अब मैं खुद आपको लेने आया हूं...सीता जल्दी से तैयार हुई और बच्चों के साथ नीचे आ गई...मुकेश का घर ज्यादा दूर ना था तो पैदल ही चल दिए...सीता मन ही मन रोच रही थी कि अगर रेखा ने कहा कि ये साड़ी तो आप कई बार पहन चुकी हैं तो मैं तो साफ कह दूंगी मेरे पति की पसंद है पहननी ही पड़ती है और भला आपने आदमी की बात कौन औरत टालती है...सीता की चप्पल थोड़ी टूटी ही हुई थी वो डर रही थी कि कहीं तेज चलते वक्त ये भी ना टूट जाए...वहीं ढंग से स्वेटर ना पहनने के कारण बच्चे भी कंपकपा रहे थे...सीता ने सोचा अपनी शॉल ही ओढ़ा देती हूं...लेकिन महिमा ने तो साफ मना कर दिया उसे लगा शॉल में उसकी नई फ्रॉक नहीं दिखेगी...खैर थोड़ी देर में लाइट चमकने लगी...मुकेश का घर आ गया था...बड़े-बड़े हैलोजन लाइट लगी थी तो कम ठंडी लग रही थी...लेकिन रोशनी की वजह से बच्चों के पुराने स्वेटर के रोएं साफ नजर आ रहे थे...अब अंशु की नजर उसके मोजों पर गई जो दो रंग थे...अब उसके बालमन में विचार आया कि फ्रॉक को लंबा कर दूंगी तो मोजे नहीं दिखेंगे...वो बार-बार फ्रॉक की खींचती लेकिन उसे क्या पता था कि खींचने से फ्रॉक लंबी नहीं हो जाएगी...तभी कुछ बच्चे दोड़ते हुए आए, उनमें महिमा और अंशु की सहेलियां भी थी...सबने बहुत ही फैशनेबल कपड़े पहन रखे थे और ऊपर से कोट भी...उनके कपड़े देखकर अंशु और महिमा के मन में लालच आने लगा...महिमा अपने बिना मोजे पहने हुए पैर छिपाने लगी कि कहीं उसकी सहेलियां ये ना बोल दें कि ये तो स्कूल वाले जूते हैं...तो वहीं अब अंशु अपने मोजे को छिपाने के लिए फ्रॉक को और तेजी से खींचने लगी...बच्चे खेल रहे थे कि किसी ने आवाज दी कि सभी बच्चे टाटपट्टी पर बैठ जाएं खाना लगने वाला है....अंशु की आंखों में चमक आ गई उसके बालमन से ये बात छू मंतर हो गई कि उसने दो पैर के मोजे पहन रखे हैं...पूड़ी सब्जी और दही रायते की लालसा उसकी आखों में साफ दिखने लगी...जैसे ही टाटपट्टी बिछी वो तुरंत जूते उतारकर बैठ गई...जूता उतारते ही सब उसे चिढ़ाने लगे की वो दो रंग के मोजे पहनकर आई है...अंशु का कोमल ह्रदय द्रवित हो उठा...आखों में आंसू छलक आए तभी बड़ी बहन महिमा बोली अंधेरे में दिखा ही नहीं कि दो रंग के मोजे हैं...कितने सुंदर लग रहे हैं अंशु तेरे पेरों में...अंशु को पता था कि ये बस ढांढस बांधने के लिए बोला गया है...पत्तलें बिछ चुकी थी...खाना परोसा जा रहा था...दोनों ने खाना शुरू ही किया था कि पीछे से सीता आई और दोंनो को उठाते हुए बोली जल्दी घर चलो...सीता ने अंशु को गोद में उठाया और महिमा का हाथ पकड़कर ले जाने लगी...अंशु गोद में थी...उसकी निगाहें पत्तल में रखी पूड़ियों पर थी...उसका हद्रय आज पूरी तरह से टूट चुका था...आखों से आंसुओं की धारा बह रही थी...वहीं महिमा हाथों में अपनी और अपनी बहन की जूती पकड़े हुए मां के साथ चली जा रही थी...देखा बहुत भीड़ थी उसके पापा जमीन पड़ पड़े थे...इतनी शराब पी ली थी कि चला तक नहीं जा रहा था...मुकेश का छोटा भाई उन्हें घर छोड़ने जा रहा था...अंशु तबतक पीछे मुड़कर देखती रही जबतक की हैलोजन की लाइट आंखों से ओझल ना हो गई...उसने अब पूड़ियों से मुंह फेर लिया था कि तभी पीछे से आवाज आई...भाभी जी रुकिए...सीता ने पीछे मुड़कर देखा तो मुकेश हाथ में टिफिन लिए खड़े थे...बोलने लगे भाभी जी खाना पैक करवा दिया है...और भइ्या को दारु मैंने ही पिलाई थी...

सीता ने मुकेश के हाथ से टिफिन लिया और बिना कुछ बोले मुकेश के छोटे भाई के साथ चल दी...

घर पहुंचते ही सीता ने टिफिन खोला और खाना परोसकर अपने बच्चों को खिलाने लगी...वहीं खाना देखकर अंशु इतनी खुश ना थी क्योंकि उसका मन तो पांत में बेठकर खाने का था...सुबह हुई अबतक हरीश भी होश में आ चुका था...बीती रात किए को लेकर वो बहुत शर्मिंदा था...उसने अंशु के सिर पर हाथ रखकर कसम खा ली कि आज के बाद वो शराब नहीं पिएगा...कुछ हप्ते बीते थे कि गांव से हरीश के भाई पैसा लेने आ गए...इस बार सीता ने मां काली का रूप ले लिया और बोली कि पति चार हजार रुपया पाता है इतने में तो मैं रानी की तरह रहूं लेकिन आपके कारण भाईसाहब हमारी भिखारियों जैसी हालत हो गई है..ना खाने को है ना पहनने को...गांव में अच्छी खेती होती है फसल होती है...उसे बेचकर आप अच्छी कमाई करते हो हमने तो कभी ना मांगा आपसे अपने खेतों का हिस्सा...और आप यहां उल्टे हमसे ही कमाई का हिस्सा लेने चले आते हैं...देखिए जी अगर आज आपने पैसे दे दिए तो बच्चों को लेकर मायके चली जाउंगी और फिर कभी ना लौटकर आउंगी...

हरीश की आंखे खुल चुकी थी उसने अपने भाई के सामने हाथ जोड़कर पैसे देने से इंकार कर दिया...

अब अंशु के पास खूब कपड़े, जूते और मोजे थे लेकिन फिर भी उसके दिल में वो दो रंग के मोजे वाली बात दबी रह गई थी।

समाप्त

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