Wrong call from right Girl

अनदेखा ख्यालों वाला प्यार


wrong call

बात उन दिनों की है जब लेंडलाइन फोन का जमाना था...मेरे घर में नया-नया फोन लगा था, बड़ा मन होता कि मैं फोन उठाऊं...जैसे ही घंटी बजती सबसे पहले मैं ही दौड़ता फोन उठाने के लिए...दादा जी डांटते भी थे कि 23 साल का हो गया है लेकिन हरकतें अभी भी बच्चों वाली हैं...मुझे समझ में नहीं आता कि मेरे फोन उठाने में कौन सी बच्चों वाली हरकत हो गई...लेकिन मानना पड़ेगा कि मेरे रहते हुए कोई भी मुझसे पहले फोन नहीं उठा पाता था...छोटी बहन भले ही कितनी भी तेज दौड़े लेकिन मुझसे ना जीत पाती थी...बड़ी बहन ने तो अब आस ही छोड़ दी थी...एक दिन घर के सभी लोग नाना जी के यहां गए थे...मुझे नहीं लेकर गए थे क्योंकि मेरे बी.ए के एग्जाम थे...मैं बेमन से किताबें पढ़ रहा था कि तभी फोन की घंटी बजी...मैं ऐसे दौड़ा जैसे कि किसी और ने उठा लिया तो मेरा रिकॉर्ड टूट जाएगा, फिर ख्याल आया कि घर में तो सिर्फ मैं ही हूं...मैंने फोन उठाया...

हैलो..

उधर से आवाज आई...

हैलो...जी मैं नीलम बोल रही हूं...

आवाज इतनी मधुर और सुरीली थी कि कोयल की कूक भी इसके आगे बिना शक्कर की चाय लगे...

मैं आवाज में खो सा गया था कि तभी फिर से आवाज आई...

जी आपको मेरी आवाज सुनाई तो दे रही है ना...

मैं अपने ख्यालों से बाहर आया और हड़बड़ाहत में बोला..

हैलो...जी हां सुनाई दे रही है...आपको किससे बात करनी है?

जी सुमन से...लड़की ने फिर अपनी सुरीली आवाज से जादू चलाया।

सुमन? सुमन मेरी बड़ी बहन का नाम था...

मैंने कहा कि वो तो इस वक्त नहीं है आप थोड़ी देर बाद फोन कीजिए...

मेरी बात सुनकर उसने फोन रखना चाहा लेकिन मेरा दिल चाहता था कि और बात करे...और फिर घर में कोई था भी नहीं तो मेरे लिए ये अच्छा मौका था...

मैंने कहा आप अपना पूरा परिचय दे दीजिए जिससे में सुमन को बता सकू कि किसका फोन था..

जी मैं उसकी सहले हूं हम एक साथ कॉलेज में पढ़ते हैं..

अरे वाह मैं भी तो उसी कॉलेज में पढ़ता हूं...तब आप मुझसे जरूर मिली होंगी क्योंकि मैं अक्सर सुमन से मिलने जाता हूं उसकी क्लास में...

वो खिलखिलाकर हंस दी...उसकी हंसी ऐसी प्रतीत होती जैसे कुमदनी खिलखिला रही हो...

उसने आगे कहा...आप अच्छा मजाक करते हैं भला गर्ल्स कॉलेज में लड़के कबसे पढ़ने लगे...

मैं सकपकाया मैंने कहा गर्ल्स कॉलेज? सुमन गर्ल कॉलेज में कबसे पढ़ने लगी...

मैंने उससे पूछा....

आप अपने कॉलेज का नाम बताएंगी?

वो बोली जी...D.L गर्ल्स डिग्री कॉलेज

मैं सकपकाया और पूछा आप सुमन का पूरा नाम बताएंगी?

उसने कहा जी सुमन मिश्रा...

मेरे मुंह से निकला औह...रांग नंबर..

वो चौंककर बोली...जी क्या कहा आपने?

मैंने उसे समझाया कि उसने गलत नंबर डायल किया है यहां सुमन मिश्रा नहीं बल्कि सुमन चौधरी रहती है जो कि मेरी बहन है और मेरे साथ मेरे ही कॉलेज में पढ़ती है...

मेरी बात सुनकर वो फिर से खिलखिलाकर हंस दी और कहा सॉरी गलती से गलत नंबर डायल कर दिया...

मैंने भी मौके का फायादा उठाते हुए कहा काश ये राइट नंबर होता और आप सुमन की सहेली होतीं...

मेरी बात सुन वो फिर से हंसते हुए बोली...लाइन मार रहे हो...लेकिन बेड लक...

मैंने तपाक से बोला..तो आप गुडलक बना दो...

वो थोड़ा शर्माते हुए बोली वो तो आपके लक पर है...हो सकता है फिर कभी रांग कॉल लग जाए...

मैंने कहा...मुझे कॉल का इंतजार रहेगा और फिर हमने एक दूसरे को अलविदा कहा और फोन रख दिया...

वैसे तो फोन पर रॉंग कॉल आते रहते थे लेकिन इस कॉल ने मेरा मन विचलित कर दिया था...पहले ही पढ़ाई में मन ना लगता था और अब तो किसी भी चीज में मन ना लगता...D.L गर्ल्स कॉलेज हमारे शहर में ही था...मन में आया कि कॉलेज में जाकर पूछूं की नीलम नाम की लड़की कौन है?

लेकिन फिर दिमाग ने चैतावनी दी कि इससे नीलम की कितनी बदनामी होगी...

पेपर खत्म हुआ और किसी तरह से मैंने अपना बी.ए पास कर लिया...पिता जी ने सरकारी नौकरी की तैयारी में लगा दिया अब मुझे शहर छोड़कर जाना था लेकिन मैं नीलम को छोड़कर जाना ही नहीं चाहता था...मन में ख्याल आता कि कहीं उसने दोबारा कॉल की और फोन उठाने के लिए मैं ना रहा तो फिर उससे मेरी कभी बात नहीं हो पाएगी...एक बार ही बात हुई लेकिन उसकी आवाज का नशा उतरने का नाम ही नहीं लेता था….माता जी इसमें मेरा साथ देती थी वो नहीं चाहती थी कि मैं उनसे दूर होऊ इसीलिए उनका सह पाकर मैं पिता जी की बातों को टाल जाता था।

मैं कई दिन से पिता जी और दादा जी की बातों को टाल रहा था...लेकिन एक दिन पिता जी सुबह-सुबह स्टेशन निकल गए और जब लौटकर आए तो उनके हाथों में बनारस की टिकट थी, बोले घर में बैठे-बैठे खाने की आदत हो गई है...बोरिया बिस्तर बांधो और परसो यहां से निकल लो...

मैं समझ चुका था कि मेरा प्यार अब पूरा ना हो पाएगा...चलो कम से कम सरकारी नौकरी हूं पा लूं जिससे पिता जी और दादा जी का सपना ही पूरा कर सकूं...

मां ने रोते-रोते तैयारियां शुरू कर दी...बेसन के लड्डू, तिल के लड्डू और ना जाने क्या-क्या बांध दिया साथ ले जाने के लिए...

मेरे मन में दुख था कि अब परिवार से दूर रहना पड़ेगा...इससे ज्यादा दुख था कि नीलम से दोबारा बात भी ना हो पाई...

मेरी दोनों बहने बहुत खुश थी कि अब फोन पहले उठाने की प्रतियोगिता नहीं होगी।

सुबह पांच बजे की ट्रेन थी...पिता जी चार बजे ही मुझे लेकर स्टेशन पर पहुंच गए...स्टेशन पर ज्यादा भीड़ ना थी...

ट्रेन सही समय पर आ गई...मैंने पिता जी के पैर छुए और अपनी कोच में चढ़ गया...मैंने महसूस किया कि पिता जी की आखें नम थी...मैं अपने शहर और अपनी नीलम से दूर जा रहा था।

शाम तक मैं बनारस पहुंच गया...पिता जी ने फोन पर ही सारी व्यवस्था कर दी थी...मेरे पास हॉस्टल का पता था...मैं वहां गया और फीस भरी...मुझे दो और लड़को के साथ कमरा साझा करना था...मैंने सोचा एक से भले तीन और मैं राजी हो गया...

मैं कमरे में गया तो पूरा पढ़ाई वाला माहौल था...दोनों लड़के अपनी-अपनी किताबों में गुम थे...मेरे आते ही उन्होंने मेरे हाथों से मेरा बेग छीन लिया और खोलते हुए बोले कि घर से खाने को क्या लाए हो?

इससे पहले कि मैं जवाब देता उन्हें लड्डुओं से भरा डब्बा मिल चुका था...वो दोनों भूखे भिखारी की तरह उसपर टूट पड़े...

फिर उन्होंने मुझे देखा और बोले क्या करे यार तीन साल से तैयारी कर रहे हैं लेकिन पी.सी.एस की परीक्षा पास ही नहीं कर पाते और अगर पास भीर कर लिया तो इंरटव्यू में निकाल दिए जाते हैं...इसी शर्म के मारे एक साल से घर नहीं गए हैं तो घर के लड्डू देख खुद को रोक नहीं पाए....

ना जाने क्यों उनकी बातें सुन मुझे उनपर दया आ गई...मैंने उन्हें वो बची हुई कचौड़ियां भी दी जो मां ने रास्ते में खाने के लिए दी थी...

रात हुई, मैं तो बिस्तर पर सोने चल दिया क्योंकि कल मेरी कोचिंग का पहला दिन था...लेकिन ये दोनों तो किताब से ऐसे चिपके थे जैसे कि रात हुई ही ना हो...

दोनों को इतना पढ़ता देख मुझे तो खुद पर शर्म आ गई और सोचने लगा कल से मैं भी खूब पढ़ूंगा भले ही इनको दिखाने के लिए पढ़ना पड़े लेकिन मैं भी देर रात तक पढ़ूंगा...

नई सुबह हुई...मन में नई कोचिंग जाने का उत्साह था..बड़े ही सलीके से पेंट और शर्ट पहनकर तैयार हुआ...हाथ में डायरी ली और चल दिया कोचिंग...

यहां कोचिंग में बहुत भीड़ थी...इस भीड़ में एक लड़की जो कि बेहद सादगी से थी लेकिन फिर भी मुझे बहुत आकर्षित लग रही थी ना चाहते हुए भी मेरी नजर ना जाने क्यों उसकी नजरों से मिल ही जाती...उसकी हिरनी जैसे आंखे भी जैसे मुझे ही देख रही थी...धीरे-धीरे वो हिरणी सी आंखे ज्वाला में बदलती नजर आने लगी...मैंने भांप लिया कि मेरा ऐसे घूरना उसे अच्छा नहीं लग रहा। मैंने तुरंत क्षमा भाव से अपनी नजरें झुका ली और खुद को कोसने लगा कि क्यों मैं नीलम के मोह से निकलकर इसे देखने लगा...

खैर टीचर जी आ गए...और आते ही उन्होंने पढ़ाना शुरु कर दिया...मेरे तो सिर के ऊपर से सब उड़ रहा था समझ ही नहीं आ रहा था कि ये क्या ऊद बिलाव पढ़ा रहे हैं...खुद को इतना अनपढ़ मैंने कभी ना समझा था...कब क्लास शुरू हुई और कब खत्म पता ही ना चला..मैं तो बस बोर्ड से अपनी डायरी में छापता जा रहा था...जाते-जाते सर ने पूछा...कोई सवाल?

पीछे से आवाज आई- जी सर

आवाज सुनते ही मेरे पूरे शरीर में एक तरंग सी दौड़ गई...ये आवाज बिल्कुल नीलम की आवाज की ही तरह सुरीली थी...मैंने पीछे मुड़कर देखा तो वही हिरणी सी नयनों वाली लड़की खड़ी थी...

मन में सवाल आया कि क्या ये ही नीलम है?

लेकिन नीलम यहां क्यों आएगी ये सोचकर मैंने मन को मना लिया...लेकिन जब उसने सवाल पूछना शुरू किया तो मुझे पूरा यकीन हो गया कि ये नीलम ही है।

लेकिन जिस तरह से ज्वाला भरी नजरों से उसने मुझे घूरा था मेरी तो हिम्मत ही नहीं हो रही थी कि मैं उससे जाकर उसका नाम पूछ सकूं...

सारी क्लासेज खत्म हो गई मैं वापस अपने हॉस्टल आ गया...रूम में कोई ना था शायद वो दोनों भी क्लास के लिए गए थे...एक घंटे बाद ही दोनों वापस आ गए...उनके आते ही मैंने लड्डुओं का डिब्बा खोलकर उनके सामने रख दिया और कहा कि मैं और भी लड्डू अपने पिता जी से मंगवा दूंगा अगर आप दोनों मेरी पढ़ने में मदद करोगे...दोनों इसके लिए तैयार हो गए...मैं कोचिंग से आता और फिर रूम में भी उन दोनों से कोचिंग पढ़ता। इस तरह से मैं पढ़ने में काफी होशियार हो गया था...और कोचिंग में सवाल पूछे जाने पर सबसे पहले जवाब देता था...लेकिन ऐसी कोई भी रात नहीं थी जब मैं नीलम के बारे में नहीं सोचता था...

मन में यही ख्याल था कि इस बार दीपावली पर घर गया तो नीलम के कॉलेज जरूर जाऊंगा और उससे अपने दिल का हाल भी कह दूंगा।

खैर कोचिंग में मैं पॉपुलर होना लगा...टेस्ट में भी मेरे अच्छे नंबर आने लगे थे...इसका पूरा श्रेय मेरे रूम पार्टनर को भी जाता था...वो ही तो जिन्होने ने मुझे जीरो से हीरो बना दिया था...हर महीने मां किसी ने किसी के हाथ से लड्डू और मिठाईयां भेजवाती रहती थी...जिसमें मुझे तो बहुत कम ही खाने को मिलता था...

इस बीच एक-दो बार मैंने उस लड़की से बात करने का मन भी बनाया क्योंकि पता नहीं उसकी आवाज सुनकर मुझे नीलम की याद आती थी...लेकिन वो हमेशा लड़कियों से घिरी रहती थी...और मेरी ही तरह और भी कई लड़के थे जो उसे पसंद करते थे...तो मेरी हिम्मत वहीं पर जवाब दे जाती।

एक दिन कोचिंग के बाहर खड़ा मैं चाय की चुस्कियां ले रहा था...मैंने देखा कि वो मृगनयनी भी वहीं खड़ी थी...वो मेरी ही तरफ देख रही थी...मेरी नजर उससे मिलते ही वो सकपका गई और इधर-उधर देखने लगी...मुझे लगा अच्छा मौका है बात करने का...मैंने एक और चाय ली और चल दिया उसकी तरफ...वो देख रही थी कि मैं उसकी तरफ आ रहा हूं...वो मंद-मंद मुस्कुरा रही थी...जब तक की मैं उसके पास तक पहुंचता पीछे से उसकी सहेली ने आते हुए कहा...ये लो नीलम महारानी यहां खड़ी हैं...और हम इनको कोचिंग के अंदर ढूढ़ रहे थे।

नीलम ना सुनते ही मेरा शरीर सुन्न पड़ गया, हाथ बेजान से हो गए और चाय का कुल्हड़ मेरे हाथों से छूटकर मेरे पैरों पर गिर गया...गर्म चाय पैर पर गिरते ही मैं चिल्ला उठा...वो दोड़ती हुई मेरे पास आई और अपने दुपट्टे से मेरे पेर से चाय पोछने लगी...वो बार-बार चिंता भरे स्वर से पूछती..तुम ठीक तो हो ना? ज्यादा जलन तो नहीं हो रही?

उसके मधुर स्वर ने मेरी सारी पीड़ा दूर कर दी थी...

उसने मुझे झकझोरते हुए पूछा...क्या हुआ कुछ बोलते क्यों नहीं?

तब जाकर में अपने खयालों से बाहर आया और पूछा...तुम D.L गर्ल्स कॉलेज वाली नीलम हो ना?

उसने शक की निगाह से मुझे देखते हुए कहां, हां..क्यों?

उसके इस जवाब से मेरे दिल की धड़कने तेज हो गई मैं खुद को रोक नहीं पाया और उसे इस तरह से गले से लगा लिया जैसे कि कुंभ के मेले में कोई बिछड़ा हुआ जब मिलता है तो उसका अपना उसे गले लगा लेता है...थोड़ी देर तक वो शांत रही फिर उसने मुझसे खुद को आजाद कराते हुए कहा...

पागल हो गए हो क्या?

मैंने कहा...हां मैं तो उसी दिन से पागल हो गया हूं जब फोन पर तुम्हारी सुरीली आवाज सुनी थी...तुमने कहा था कि तुम मेरा बेड लक गुड लक में बदलोगी लेकिन तुमने तो दोबोरा फोन ही नहीं किया?

नीलम सारी बात समझ चुकी थी...वो उल्टा मुझसे ही गुस्सा होकर बोली कि...तुम भी तो मुझे कॉल कर सकते थे...क्या तुम्हारा मन नहीं हुआ कि तुम मुझे वापस से कॉल कर सको?

मैंने कहा कि मुझे तुम्हारी इज्जत का डर था तुम्हारे घर में कोई और फोन उठा लेता तो फालतू में तुम्हे डांट पड़ती...

वो मेरी बातों को समझ चुकी थी...

उसने कहा कि वो मेरे फोन का इंतजार करती रही...एक बार फोन किया भी था लेकिन किसी लड़की ने फोन उठाया तो मैंने डर के मारे फोन रख दिया...समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं...मुझे लगा कि अब हम कभी नहीं मिल पाएंगे...लेकिन देखो हम मिल ही गए।

अब मेरा पहले से भी ज्यादा पढ़ाई में मन लगने लगा था...छुट्टी वाले दिन अक्सर हम पार्क में साथ में बैठकर पढ़ाई करते...एक दिन मैंने उससे अपने प्यार का इजहार कर दिया...नीलम की आंखे नम हो गई उसका गला घर आया...बोली मेरे घर वाले इस रिश्ते के लिए कभी नहीं मानेंगे...

मैंने कहा अरे मैं नौकरी करूंगा तुम नौकरी करोगी तो मान जाएंगे....हमने पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देना शुरु कर दिया...देखते ही देखते बैंक की परीक्षा भी दे दी…लेकिन अफसोस कि मैं परीक्षा में पास ना हो सका...वहीं नीलम ने पहली ही बार में परीक्षा पास कर ली...

किसी ने पिता जी से शिकायत कर दी कि मैं लड़की के प्रेम में पड़ चुका हूं इसीलिए पढ़ाई नहीं करता हूं...

पिता जी ने आव देखा ना ताव सीधा धमक पड़े बनारस...संयोग वस उस दिन मैं नीलम के साथ फिल्म देखने गया था...देर शाम जम रूम पर पिता जी को देखा तो मानों मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई...पिता जी ने ना आव देखा ना ताव एक जोरदार तमाचा रसीद दिया मुझे...मेरी आंखों से आंसु निकल आए...

पिता जी का गुस्सा शांत नहीं हुआ था..बोले इश्क लड़ाने आए हैं जनाब यहां...देखो वो चालाक लड़की पा गई सरकारी नौकरी और तुम यहीं के यहीं रह गए...उनके जैसी लड़कियों को मैं अच्छे से जानता हूं...लड़के फंसाकर उनके पैसे पर मजे करती हैं फिर निकल लेती हैं...

पिता जी बोले जा रहे थे और मैं सिर झुकाकर सब सुन रहा था...मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि इन सब में नीलम की क्या गलती है...उसने तो मुझे कभी भी पढ़ने से नहीं रोका और तो और हम साथ में बैठकर पढ़ते थे...अब वो पास हो गई और मैं फैल तो इसमें उसका क्या कसूर...

पिता जी ने मुझे जी भर के सुना लिया और फिर वहां से अपने दोस्त के यहा निकल गए...

पिता जी के जाने के बाद मैंने मन बना लिया कि अब जबतक मेरी सरकारी नौकरी नहीं लग जाती मैं घर नहीं जाऊंगा...

मैं सिविल की तैयारी में लग गया और नीलम की नौकर दूसरे शहर में लग गई...

अब वो कभी-कभी मेरे हॉस्टल में फोन करके मुझसे बातें कर लेती थी...हां पत्र हर हप्ते आ ही जाता था...ऐसा नहीं है कि नीलम के जाने के बाद मैं बिल्कुल टूट गया था लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि अब अच्छा ना लगता था...नीलम महीने में एक बार मुझसे मिलने जरूर आती और मेरे लिए किताबें भी खरीदकर लाती...उसका इतना प्यार देख नौकरी पाने की चाहत और बढ़ जाती...

एक दिन हॉस्टल में मेरे नाम का फोन आया...मैं फोन के लिए गया तो वो नीलम का फोन था...वो रो रही थी...बोली पिता जी का देहांत हो गया है...मैं उसे समझाते हुए बोला कि तुम घर के लिए निकलो मैं भी तुम्हें अपने स्टेशन पर मिलूंगा...ट्रेन बनारस होकर ही गुजरती थी तो मैं उसे स्टेशन पर ही मिल गया...हम दोनों साथ में उसके घर गए...मुझे देखते ही उसके चाचा जी ने सवाल शुरू कर दिए कि ये लड़का कौन है...मैंने अपना परिचय दिया कि उन्होंने मुझे मारना पीटना शुरू कर दिया...नीलम बार-बार मुझे बचाने के लिए बीच में आ जाती...कुछ चोटें उसे भी लगी थी...वो बहुत रो रही थी...किसी ने मेरे घर पर खबर कर दी कि आपके लड़के को पीटा जा रहा है।

पिता जी लाठी डंडा लेकर लोगों के साथ वहां पहुंच गए...मुझे जख्मी देख उन्होंने भी नीलम के चाचा पर डंडे बरसा दिए...मामला इतना बढ़ गया कि शव यात्रा में पुलिस को आना पड़ा...

पिता जी मुझे घर ले आए...उधर नीलम के घर वालों ने उसके लिए रिश्ता देखना शुरू कर दिया और तो और नौकरी छुड़ाने की भी बात करने लगे...

रात में फोन की घंटी बजी...सब सो रहे थे तो मैंने फटाक से फोन उठा लिया...आवाज नीलम की ही थी...वो रोते हुए बोली कि मुझे यहां से ले चलो...चलो मंदिर में शादी कर लेते हैं...

मैंने कहा अभी तो मैं कमाता भी नहीं हूं

तो क्या हुआ मैं तो नोकरी कर रही हूं...प्लीज मुझे ऐसे मत छोड़ो वरना मैं जान दे दूंगी...मैंने रात में ही भागने की योजना बनाई और बस पकड़ कर पहले हम लखनऊ गए और फिर वहां से ट्रेन पकड़कर सीधे बनारस में जाकर मंदिर में शादी कर ली...

मैंने डरते-डरते अपने घर फोन किया...मेरी आवाज सुनते ही पिता जी फफक-फफक कर रोने लगे...बोले बेटा हम तो डर गए थे कि कहीं तुम्हें कुछ हो तो नहीं गया है...

मैंने पिता जी को सारी बात बताई और ये भी बताया कि मैंने शादी कर ली है...पिता जी पहले तो नाराज हुए लेकिन फिर मान गए...उन्होंने मुझसे कहा कि नीलम के घर को वो संभाल लेंगे...

मैंने अपना बोरिया बिस्तर बनारस से उठाया और नीलम के शहर में उसके साथ रहने लगा...

किस्मत ऐसी कि पहली ही बार में मैंने सिविल सर्विसेज की परीक्षा पास कर ली...पिता जी बहुत खुश थे...बोलते थे कि बहु लक्ष्मी का रूप है...इस तरह से एक wrong call मेरी जिंदगी में एक right girl ले आई। आज में रिटायर होने वाला हूं लेकिन नीलम अभी तीन साल तक और नौकरी करेगी।

समाप्त

2 Comments

Unknown said…
Hello tring tring koi hai
Ravi said…
भाई मौज करा दी।