रेडियो: Lucknow वाली लव स्टोरी

लखनऊ वाली love story


नमस्कार, आदाब...गुड मॉर्निंग लखनऊ...मैं गुनगुन आपकी दोस्त हाजिर हूं आपकी सुबह में एक नई उमंग भरने के लिए...

R.J गुनगुन मेरी पसंदीदा R.J थी...ना जाने क्या जादू था उसकी आवाज में कि सारे काम छोड़कर मैं उसी का शो सुनता रहता...

मैं गांव में रहता था और मेरे यहां मनोरंजन का एक मात्र सहारा था रेडियो...हमारा परिवार बहुत बड़ा था और घर के बड़े बुजुर्गों के पास अपना-अपना रेडियो था...इसकी वजह ये भी कि किसी को B.B.C पसंद था तो किसी विविध भारती...गर्मी में रात में छत पर सोते वक्त सब अपने-अपने कान के पास रेडियो लगाकर कोई न्यूज तो कोई गाने सुन रहे होते...उनको रेडियो से ऐसा लगाव था कि खेतों में काम करते वक्त भी रेडियो ले जाते...ऐसे में हम बच्चों के लिए रेडियो सुनना तभी संभव हो पाता था जब दोपहर में वो लोग सो जाए...

वैसे मेरे पिता जी सरकारी नौकरी करते थे और रेडियो में उनका कोई खास इंटरेस्ट नहीं था...लेकिन रेडियो उनके पास भी था और वो रविवार को पूरा दिन बस रेडियो ही सुनते रहते थे...

सब बड़े हुए तो परिवार भी अलग हो गया...अब मेरा अपना घर था जहां मैं तेज आवाज में रेडियो सुन सकता था...मेरी आदत बन चुकी थी कि मैं गुनगुन का प्रोग्राम सुनते-सुनते ही कॉलेज जाने के लिए तैयार होता जिससे कभी-कभी मैं कॉलेज के लिए लेट भी हो जाता...फिर तो मैं ऐसे साइकिल चलाता जिसके आगे मोटरबाइक भी फेल थी...

कई दिनों से मुझे सुबह गुनगुन की आवाज सुनाई नहीं दे रही थी...ना जाने क्यों अब सुबह उतनी अच्छी नहीं जाती थी जितनी पहले उसकी आवाज सुनने के बाद जाती थी...मुझे लग रहा था कि शायद उसने सुबह का शो छोड़ दिया है...15 अगस्त की छुट्टी वाले दिन मैंने पूरा दिन रेडियो सुना कि शायद दिन में उसका शो आता हो...लेकिन मैं गलत था...दिन बीत गया औऱ रात को मैं पापा से छुपाकर रेडियो अपने कमरे में उठा लाया...रेडियो ऑन ही किया कि गुनगुन की चहकती आवाज मेरे कानों में पड़ी...मैं खुशी से चीख उठा कि पापा छत से चिल्लाए...क्या हो गया...

मैंने कहा कुछ नहीं चूहा आ गया था पैर के पास...दरअसल गर्मियों में सब छत पर सोते थे लेकिन मैं पढ़ाई करने के लिए नीचे ही अपने कमरे में सोता था...लालटेन की रोशनी किताबें खुली हुई...बगल में रेडियो और गाना चल रहा था...हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना...तो मेरी रात गुनगुन के साथ ही बीतती...एक रात तो मेरे हाथ से रेडियो गिर गया और उसका एंटीना टूट गया...मुझे याद है मैंने मां की स्वेटर बुनने वाली सलाई उसमें जोड़ दी थी...पिता जी को पता चला तो खूब डांट पड़ी थी...मेरी बीए की पढ़ाई खत्म हो चुकी थी और आगे की पढ़ाई के लिए मैंने लखनऊ विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया...

कॉलेज का पहला दिन इतना बड़ा विश्वविद्यालय कि मुझे लगता कि मैं कहीं खो ना जाऊं...कॉलेज के पास ही मैंने हॉस्टल लिया था...और जनाब यहां तो मेरे जैसे ना जाने कितने ही गुनगुन के फैन थे....रात में सब इक्ट्ठा होकर उसका शो सुनते थे...जिंदगी अच्छे से कट रही थी...एक दिन मैं क्लास के लिए लेट हो रहा था...और दौड़ते हुए क्लास की तरफ भाग रहे था कि तभी एक लड़की मुझसे टकरा गई...बिल्कुल फिल्मी स्टाइल में हमारी हाथों से किताबें गिरी और हम दोनों एक दूसरे को देखते रह गए...तभी उसने कहा माफ करना मैंने आपको देखा नहीं...मुझे उसकी आवाज जानी पहचानी लग रही थी...

मैंने कहा अरे नहीं गलती मेरी है...मैं ही भागते हुए जा रहा था...

मैंने हाथ की घड़ी की तरफ देखा और मुंह बनाते हुए कहा...अब तो क्लास के लिए ज्यादा लेट हो गया...

उसने कहा चाय पियोगे...मैंने तुरंत हां कर दी...

बातों-बातों में पता लगा कि उसका नाम मिताली है और वो भी यहां से एम.ए कर रही है उसने एक महीने लेट क्लास ज्वाइन की है...

मुझसे रहा नहीं गया और मैंने उससे कहा कि उसकी आवाज बिलकुल गुनगुन की तरह है पहले वो सकपकाई और फिर अनजान बनते हुए बोली कि कौन गुनगुन...

मैंने कहा तुम गुनगुन को नहीं जानती...मेरी तो रात ही उसकी आवाज सुनते हुए बीतती है...

वो हंसने लगी और बोली हां मैं भी कभी-कभी रेडियो सुनती हूं...

यहां पर मैं जहां रहती हूं वहां टी.वी भी है तो रेडियो कम ही सुनती हूं...हमने चाय पी और उपने-अपने रास्ते चल दिए...अब मेरा मिताली से अक्सर मिलना जुलना हो जाता था...हमारी दोस्ती भी गहरी हो गई थी...बस एक दिक्कत थी कि मैं उसके बारे में कम और गुनगुन के बारे में ज्यादा बात करता था...एक दिन तो हमारा भयानक झगड़ा हो गया और वो सिर्फ इस बात के लिए कि मैंने उससे कहा दिया कि मुझे उससे बात करना इस वजह से पसंद है क्योंकि उसकी आवाज गुनगुन की तरह ही सुरीली औऱ दिल को छूने वाली है...उसकी आखों में आंसु आ गए थे...

उस झगड़े के बाद से उसने कॉलेज आना बंद कर दिया था...उसके कॉलेज ना आने से मेरा दिल आब कॉलेज में ना लगता था...उसकी आदत सी हो गई थी मुझको, ठीक वैसे ही जैसे गुनगुन की हो गई थी...उस समय तो फोन भी ना था कि मैं उससे कह सकूं कि कॉलेज में उसके ना रहने से मेरा क्या हाल होता है...शायद मुझे उससे प्यार हो गया था...जिसका एहसास मिताली के चले जाने के बाद हो रहा था...कॉलेज से आने के बाद मैं गुनगुन का शो सुन रहा था...गुनगुन का शो बदल चुका था और अब वो रात के 11 बजे आने लगा था...

गुनगुन ने कहा...नमस्कार आदाब लखनऊ...जैसा कि आप जानते हैं कि आपको कोई सुन नहीं सकता तो अपना टेलीफोन उठाइए और आज आप हमसे अपने दिल की बात करिए...मैं सीधे हॉस्टल के गेट की तरफ भागा...वहां टेलीफोन था जिससे हम सब अपने परिवार वालों से बात करते थे...

मैंने गार्ड से मिन्नत की कि वो मुझे बस एक कॉल कर लेने दें...10 रुपए देने के बाद वो मान गया...मैंने रेडियो पर दिए गए नंबर फोन मिलाना शुरू किया...लगभग दस बार फोन लगाने के बाद आखिरकार फोन लग ही गया...

रेडियो से आवाज आई- जी नमस्कार आपका स्वागत है हमारे शो "दिल की बात" में...आपका नाम?

मैं- जी मैं अपना नाम नहीं बताना चाहता...

मेरी आवाज सुनने के बाद वो थोड़ी देर के लिए चुप हो गई...

गुनगुन- जी क्या है आपके दिल में आप बोल दीजिए...

मैंने कहा...मुझे नहीं पता कि जिसके लिए मैं ये कहने जा रहा हूं वो ये सुन भी रही है या नहीं लेकिन मैं अपने दिल की बात उससे कहना चाहता हूं...सुनो तुमसे मुझे प्यार हो गया है...कब हुआ कैसे हुआ पता नहीं लेकिन सिर्फ तुम्हारी आवाज की वजह से मुझे तुमसे प्यार नहीं है बल्कि तुम्हारी वो झल्लियों वाली आदत... तुम्हारा मेरे गलत होने पर मुझे डांटना...खुशी में झूम उठना नाचकर खुशी मनाना और सच के लिए लड़ने वाली बातों ने मुझे तुम्हारा दीवाना बना दिया है...कॉलेज में अब तुम्हारे बिना दिल नहीं लगता...और अगर तुम कहो तो मैं गुनगुन का शो सुनना भी बंद कर दूंगा लेकिन प्लीज तुम वापस कॉलेज आ जाओ...दिल की और भी बहुत सी बातें हैं जो तुमसे मिलकर कहनी है प्लीज मिताली मुझे माफ कर दो...

इतना ही कहा था कि गॉर्ड ने फोन छीनकर काट दिया और कहा 10 रुपए में बस इतना ही...

मैं दौड़ते हुए कमरे में गया और फिर से रेडियो ऑन किया...अभी तो गाना आ रहा था...गाना खत्म होते ही मेरी आवाज सुनाई दी...रेडियो पर मेरी आवाज बेहद अच्छी लग रही थी...

अगली सुबह कॉलेज में मुझे मिताली दिखाई दी...वो काफी खुश लग रही थी...मेरे पास आते ही उसने मुझे एक पर्चा थमा दिया...मैंने बिना पर्चा देखे उससे पूछा... क्या तुमने कल गुनगुन का शो सुना था?...

उसने कहा नहीं...क्यों?

मैंने कहा कुछ नही बस यूं ही पूछा था...

उसने कहा पर्चा तो देखो...मैंने देखा तो रेडियो में एक R.J की वैकेंसी निकली थी...

मैंने कहा मैं इसका क्या करूंगा...

वो बोली अगर इसमें नौकरी लग गई तो अपने प्यार गुनगुन से रोज मिलने को मिलेगा...

मैं खिसिया सा गया...मैंने कहा मेरा प्यार गुनगुन नहीं तुम हो...

उसने मुझे अनसुना कर दिया...

खैर मुझे नौकरी की तलाश थी तो मैंने रेडियो स्टेशन के ऑफिस जाकर इंटरव्यू देने में ही अपनी भलाई समझी...

रविवार का दिन...मैं पर्चे पर दिए हुए पते पर पहुंचा...वहां मुझसे साइन कराया गया और अंदर भेज दिया गया...कितनी लंबी लाइन लगी थी...मेरा नंबर आया और इंटरव्यू बहुत अच्छा गया...मेरी आवाज सबको बहुत पसंद आई...

मैं इंटरव्यू देकर बाहर निकल ही रहा था कि मुझे मिताली दिखी...मुझे लगा कि वो भी नौकरी के लिए आई होगी और फिर उसकी आवाज तो गुनगुन से हूबहू मिलती है...तबतक मैं उसे आवाज देता किसी से उसे आवाज दी और कहा...

गुनगुन अपनी स्क्रिप्ट देख लो फिर बाद में कहना कि क्या लिखा है समझ में नहीं आ रहा...

मिताली और गुनगुन...मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई...तभी मिताली ने भी मुझे देख लिया और मेरे तरफ हंसती हुई आई और बोली क्यों क्या हुआ भूत देख लिया क्या..

मैंने सवालों के ढेर लगा दिए...

तुम ही गुनगुन हो?

तुमने नाम क्यों छिपाया...

मुझे बताया क्यों नहीं...

वो हंसते हुए बोली...शांत महाशय सब बताती हूं...

दरअसल मैं नहीं चाहती थी कि कॉलेज में कोई मुझे पहचाने क्योंकि इससे मैं एक आम लड़की की तरह पढ़ाई नहीं कर पाती...और तुम्हे तो इसलिए नहीं बताया क्योंकि तुम मुझे नहीं बल्कि मेरी आवाज को प्यार करते थे...

लेकिन जब तुमने रेडियो पर अपने दिल की बात मुझसे कही तो मैंने ठान लिया कि तुम्हे तो बता ही सकती हूं...इसीलिए तो मैं तुम्हे यहां सरप्राइज करना चाहती थी...

मेरी आंखों में आंसु आ गए...मैं भगवान को धन्यवाद दे रहा था कि उसने मेरे दोनों प्यार को एक में ही पिरोकर भेज दिया था...

एक हप्ते बाद मेरे पास चिट्ठी आई कि रेडियो स्टेशन में मेरी जॉब लग गई है...

अब गुनगुन ओह सॉरी...यानि कि अब मैं और मिताली एक साथ रात को 11 बजे का शो करते हैं...आप हमें जरूर सुनिएगा...शो का नाम है..."हम हैं राही प्यार के"

समाप्त

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